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इस एपिसोड में, सुप्रीम मास्टर चिंग हाई हिंसा की जड़ों का खुलासा करती हैं और बताती हैं कि संघर्ष पैदा करने वालों को अक्सर सबसे अधिक प्रेम की आवश्यकता क्यों होती है। ईश्वर के साक्षात्कार के माध्यम से अपने भीतर के दिव्य प्रेम को जगाकर, हम स्वयं को और दूसरों को इस दुनिया के दुख से मुक्त कर सकते हैं।कई लोगों के लिए, यह जानकर ही संतुष्ट होते हैं कि ईश्वर मौजूद है, या सिर्फ बाइबिल पढ़ना, या इधर-उधर कुछ छोटी-मोटी प्रार्थनाएँ करना। लेकिन कई लोगों, अन्य लोगों के लिए, यह पर्याप्त नहीं है। वे ईश्वर को सचमुच जानना चाहते हैं। वे ईश्वर से बात करने सक्षम होना चाहते हैं, रोज़मर्रा की समस्याओं पर ईश्वर की सलाह सुनना चाहते हैं, और ईश्वर के और अधिक करीब होना चाहते हैं – सचमुच ज्यादा करीब। और इन लोगों के लिए, हम थोड़ी मदद करने के लिए यहाँ हैं।क्योंकि युद्ध और परेशानियाँ, गलतफहमी, क्रोध, घृणा ये सभी ईश्वर को न जानने की इस निराशा के परिणाम हैं। सभी बुराइयाँ जो हमें लगता है कि मानव जाति करने काबील है, वे ईश्वर के ज्ञान की इस प्यास से आती हैं। यह विडंबनापूर्ण, विरोधाभासी है, लेकिन यह सच है। यह मदद के लिए एक हताश पुकार है। क्योंकि वे बस यह नहीं जानते कि और क्या करें। इसलिए उन्हें हिंसा का सहारा लेना पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे आप ज़ोर से चिल्लाते हैं। यह ऐसा क्यों है? क्योंकि भले ही हम इंसान की तरह दिखते हैं और यह मानव शरीर धारण करते हैं, हम ईश्वर की संतान हैं; हम पवित्र आत्मा हैं। हम स्वर्ग में रहते थे, जहाँ हमारे पास पूर्णतया हर चीज़ थी, जब भी हम चाहते।"क्या आप नहीं जानते, कि आप परमेश्वर का मंदिर हो, और पवित्र आत्मा आप में वास करता है।" इसका मतलब है कि हम अंदर से कुछ और नहीं बल्कि परमेश्वर ही हैं। क्योंकि हम वही परमेश्वर हैं, हम अपनी ज़रूरत की चीज़ों के लिए काम करने के आदी नहीं हैं, अपनी चाहत की चीज़ों के लिए माँगने के आदी नहीं हैं, और उन्हें पाने के भी आदी नहीं हैं। इसलिए कभी-कभी हम निराश महसूस करते हैं, हम क्रोधित महसूस करते हैं, और हम निराश और असहाय महसूस करते हैं। और इस प्रकार कभी-कभी, यह निराशा हिंसा, घृणा और अंततः युद्ध को जन्म देती है।तो जो लोग युद्ध करते हैं, वे वास्तव में प्रेम और मदद के लिए सबसे अधिक बेताब होते हैं। लेकिन क्योंकि वे अपनी निराशा में इतने अड़े होते हैं, इसलिए उनके अस्तित्व की स्थिति में प्रेम, ज्ञान और समझ लाना भी बहुत आसान नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति पहले से ही इतना बीमार हो कि वह डॉक्टरों को भी न पहचान पाए, और तो और, उनके आभारी भी न हो। इसलिए, इससे पहले कि हम इस निराशाजनक स्थिति में पड़ें, हमें अपना ख्याल रखना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम ईश्वर के प्रेम को और अधिक व्यावहारिक रूप से, इतनी निकटता से पा सकें, ताकि हमें कभी भी इस गहरी निराशा की ऐसी असहाय स्थिति का अनुभव करने की ज़रूरत न पड़े।निस्संदेह ईश्वर हम सभी से प्रेम करते हैं, चाहे हम कुछ भी करें। [प्रभु] यीशु हम सभी को माफ कर देते हैं, चाहे हम कुछ भी करें, यहाँ तक कि उनके साथ व्यक्तिगत रूप से भी। उन्होंने अपने शत्रुओं को क्षमा किया और उनके लिए प्रार्थना की: "पिता, उन्हें क्षमा करें, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।"हर बार जब मैं [प्रभु] यीशु के बारे में फिर से कुछ पढ़ती हूँ, तो मैं हमेशा रोना चाहती हूँ। इतना महान प्रेम केवल परमेश्वर से ही आ सकता है। हम स्वयं सभी परमेश्वर की संतान हैं। यह प्रेम हमारे पास क्यों नहीं है? हमारे पास भी है। बस इतना है कि हमने इसे सक्रिय नहीं किया है। हम भूल गए हैं कि कैसे। हम में प्रेम है, लेकिन प्रभु यीशु के विस्तार-क्षेत्र का नहीं। इसे फिर से पाने के लिए, हम अभी भी प्रयास कर सकते हैं। परमेश्वर हमारे सभी पापों को क्षमा करता है। प्रभु यीशु हमें क्षमा करते हैं; वह हमारे लिए मरते हैं।और हम प्रभु की दृष्टि में हमेशा समान रहेंगे। तो फिर हमें ईश्वर को जानना ही क्यों चाहिए? हमें यह प्रेम सक्रिय ही क्यों करना चाहिए? हमें कोई प्रयास ही क्यों करना चाहिए? कोई जानता है? ठीक है, चूँकि आप दिखावा करते हो कि आप नहीं जानते, तो मैं दिखावा करूँगी कि मैं जानती हूँ। मैं भी बहुत शर्मीला हूँ, लेकिन अगर हम सब शर्मीले होंगे, तो हम बस यहीं बैठेंगे, और मैं आपको देखूँगी, आप मुझे देखोगे, और फिर दो घंटे बीत जाएँगे, और फिर हम घर चले जाएँगे। क्योंकि अगर हम इस प्रेम को सक्रिय नहीं करते हैं, तो हम खुद ही दुखी होंगे। और बेशक, हम कभी-कभी अपने प्रियजनों को, हमारे संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति को, और अपने परिवेश को दुख पहुँचाते हैं; कभी-कभी अपने राष्ट्र को भी,अगर हम कोई गलत फैसला लेते हैं, कोइ बहुत ही अप्रेमपूर्ण फैसला, जैसे कि उदाहरण के लिए, युद्ध करना। हमें इस प्रेम को ईश्वर को जानने के लिए नहीं,बल्कि यह जानने के लिए सक्रिय करना चाहिए कि हम ईश्वर का एक हिस्सा हैं, हम ईश्वर के साथ एक हैं, जैसे प्रभु यीशु ने कहा था, "मैं और मेरे पिता एक हैं।"हम केवल बात करके, केवल सोचकर, या केवल इच्छा करके ईश्वर के साथ एक नहीं हो सकते। हमें वास्तव में ईश्वर के साथ एक होना है, पृथ्वी पर ईश्वर बनना है। हमें फिर से उस सागर से जुड़ना है, प्रेम के सागर के साथ एक हो जाना है। तब हम इस ग्रह पर ईश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। ईश्वर के सभी शानदार गुणों, ईश्वर की सभी प्रेमपूर्ण दयालुता, हम उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और अपने आस-पास के सभी लोगों के लिए प्रेम, आनंद, दया और खुशी ला सकते हैं।ईश्वर को जानने के बाद – जानने के बाद, सचमुच जानने के बाद, मेरा मतलब है, लगभग भौतिक रूप से जानने के बाद, सचमुच यह जानने के बाद कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर रहती है – हमारे पास दो विकल्प होते हैं।पहली पसंद यह है कि हम वैसे ही जीते रहें जैसे पहले जीते थे, लेकिन यह यकीन रखकर कि, "ठीक है, अब मैं ईश्वर को जानता हूँ। वह मौजूद है। कोई समस्या नहीं।" यानी, जो हम करते हैं, उसे करते रहें। और हम हर दिन ईश्वर को और अधिक जानना भी जारी रख सकते हैं – ईश्वर की उपस्थिति, हमारे भीतर ईश्वर के होने के बारे में और अधिक आश्वस्त होते हुए – या हम इसे बंद भी कर सकते हैं। लेकिन एक बार जब हम इसका अनुभव कर लेते हैं, तो हम भूलेंगे नहीं।और एक और विकल्प अधिक उत्तम है। यह है कि हम अपने जीवन, अपने ज्ञान को अपने भाइयों और बहनों के जीवन और खुशी की बेहतरी के लिए समर्पित करें। कारण हम त्यागियों, भिक्षुणीयों और संतों का सम्मान क्यों करते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि वे ईश्वर की तरह काम करते हैं। वे पृथ्वी पर लगभग ईश्वर के समान हैं। वे इतने दयालु हैं। वे इतने स्नेही हैं। वे इतने शर्तहीत हैं। उन्होंने अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया। हम भी उनके जैसे बन सकते हैं, लेकिन दुनिया में, अपने परिवार के भीतर, अपनी नौकरी में, अपनी वर्तमान स्थिति में, और एक तरह के नामरहित संत बने रह सकते हैं।ईश्वर को जानकर, हम ईसाई बनेंगे, हम संत बनेंगे, चुपचाप हमारी ज़िंदगी में। और हम लोगों को भी आशीर्वाद देंगे, चुपचाप। किसी को इसका पता भी नहीं चलेगा।Photo Caption: "स्वर्ग से धरती तक बीच में इंसानों के लिए"











